गांव की सीमा पर बनी पुरानी हवेली को सभी "भूतों का आशियाना" कहते थे। रात के ग्यारह बजे, चांदनी रात में, राधा ने हवेली के पास जाना तय किया। उसका भाई, मोहन, एक हफ्ते पहले लापता हो गया था, और गांव वालों का मानना था कि हवेली ने उसे निगल लिया। राधा का दिल डर से कांप रहा था, लेकिन भाई की खोज ने उसे हिम्मत दी।
हवेली का लोहे का दरवाजा चरमराया। अंदर, धूल भरी हवा में सड़ांध की बू थी। राधा ने अपनी टॉर्च जलाई। दीवारों पर टूटी तस्वीरें लटक रही थीं, जिनमें चेहरों की आंखें खाली थीं। हर कदम पर फर्श कराहता था। अचानक, टॉर्च की रोशनी में एक छाया दीवार पर नाचती दिखी। राधा रुक गई। "कौन है?" उसकी आवाज गूंजी, लेकिन जवाब में केवल सन्नाटा था।
सीढ़ियां चढ़ते वक्त, उसे लगा कोई पीछे चल रहा है। उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहां कोई नहीं था। ऊपरी माले पर एक कमरा था, जिसका दरवाजा आधा खुला था। राधा ने धीरे से दरवाजा खोला। अंदर, एक पुराना आईना था, जिसकी सतह पर धुंध जमी थी। राधा ने उसे साफ किया, और उसका दिल दहल गया। आईने में उसका प्रतिबिंब नहीं था—बल्कि, एक पीला चेहरा, खोखली आंखों और मुड़ी हुई मुस्कान वाला, उसे घूर रहा था।
"राधा..." एक फुसफुसाहट कमरे में गूंजी। उसने टॉर्च घुमाई, लेकिन कमरा खाली था। तभी, आईने से खून टपकने लगा। राधा चीख पड़ी और भागने लगी। सीढ़ियों पर उसे लगा कि कोई उसे खींच रहा है। उसने मोहन का नाम पुकारा, और जवाब में एक ठंडी हंसी गूंजी।
नीचे पहुंचते ही, उसने देखा कि हवेली का दरवाजा बंद हो चुका था। वह जोर-जोर से चिल्लाई, लेकिन बाहर का सन्नाटा उसे चिढ़ा रहा था। तभी, फर्श के नीचे से खटखट की आवाज आई। राधा ने डरते हुए फर्श की ओर देखा। एक ठंडी सांस उसकी गर्दन पर महसूस हुई। "मोहन?" उसने कांपते स्वर में पूछा। जवाब में, फर्श फट गया, और एक काला हाथ उसे नीचे खींचने लगा।
राधा की चीख हवेली में गूंजती रही, लेकिन सुबह जब गांव वाले आए, तो हवेली खाली थी। राधा और मोहन का कोई निशान नहीं था। केवल वही पुराना आईना वहां खड़ा था, जिसकी सतह पर अब दो नए चेहरे उभर आए थे—राधा और मोहन, खोखली आंखों के साथ, हमेशा के लिए हवेली का हिस्सा बन चुके थे।
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